Wednesday, 19 January 2011

कर्ज का कलंक

लोन लेकर घी पीने की बात से लगभग सभी वाकिफ होंगे। यह सिद्धांत तो भारत की देन है किंतु यहॉ इसे कभी व्यवहार में लाना ठीक नहीं समझा गया। लेकिन यही तरीका अपनाकर यूरोप के कुछ देश आज बदहाली की कगार पर पहुंच गए हैं। अब एक भय यह पैदा हो गया है कि कहीं विश्व पुनः आर्थिक मंदी की जाल में ना फंस जाए। इस मंदी का ताजा शिकार अब ब्रिटेन हो रहा है... आर्थिक मंदी ने ब्रिटेन की हालत पतली कर दी है। बेरोजगारों की तादाद बढ़ रही है। और सरकार कर्ज के भाड़ी बोझ के तले दब रही है। अब तो वहां की सरकार को घुटन महसूस होने लगी है। ब्रिटेन करीब एक खरब पाउंड कर्ज का शिकार हो गया है। वहां की जनसंख्या से इसे अगर भाग किया जाए तो ये आंकड़े ब्रिटेन में हरएक परिवार 40 हजार पाउंड यानी करीब 29 लाख रुपए के कर्ज हैं। ये इतिहास में पहली बार हुआ है जब सरकार इतनी भारी भरकम कर्ज के बोझ के तले दबी हो। ब्रिटेन के वित्तमंत्री एलिस्टर डार्लिंग ने स्वीकार किया है कि देश 60 सालों में सबसे ख़राब आर्थिक स्थिति का सामना कर रहा है। उन्होंने कहा है कि आर्थिक मंदी का यह दौर द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद का सबसे ख़राब दौर है और यह लोगों की कल्पना से ज़्यादा गंभीर और देर तक चलने वाला है। हालांकि बढ़ते सरकारी घाटे से निपटने के लिए वहां की सरकार, सरकारी संपत्तियों की नीलामी भी कर रही है। लेकिन ये भी ऊंट के मुंह में जीरा ही साबित हो रहा है। बेरोजगारी का आलम तो यह है कि वहां पिछले 2 साल मे 6 लाख से ज्यादा लोग बेरोजगार हो चुके हैं। इतना ही नहीं पिछले 2 महीने के दौरान ही करीब 33 हजार सरकारी कर्मचारियों को भी अपनी नौकरी गंवानी पड़ी है। कहा जा रहा है कि आने वाले दिनों में ब्रिटेन में हालात और बुरे होने वाले हैं। देखना होगा कि इन कठिन चुनौतियों से निपटने के लिए अब वहां की सरकार क्या ठोस कदम उठाती है।

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