Monday, 17 January 2011

कहने को देश आर्थिक विकास के तीसरे पायदान पर है। पर सच ये है कि देश की आबादी का एक बड़ा हिस्सा आर्थिक रूप से खुद को असुरक्षित महसूस करता है। दूसरी तरफ सरकार पिछले साल के मुकाबले इस साल विश्व बैंक से चार गुना ज्यादा कर्ज ले रहा है और यानी कर्जखोरी के मामले में देश दुनिया में अव्वल बनने जा रहा है। कर्ज का मकसद देश की सड़क, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधा को बेहतर बनाना है।सरकारी खर्चों पर बहस होती है लगाम नहीं लगायी जाती है। विपक्ष कितना भी हल्ला-हंगामा मचा ले सरकार कान देने को तैयार नहीं है। लाल सलाम का रंग तो कब का फीका पड़ चुका है। देश में महंगाई का हाहाकार मचा हुआ है। लेकिन सरकर तेल, गैस जैसी चीजों से सब्सिडी हटा कर और वैट बढ़ा कर फिजूल खर्ची में जुटी है। खास बात तो ये है आम आदमी से जुड़ी चीजों पर सब्सिडी उस वक्त तय की गयी थी जब देश में विकास दर कम थी प्रति व्यक्ति आय कम थी। गरीबी से जूझ रहे देश में खाद तेल, ईधन जैसी चीजों पर सब्सिडी दी गयी थी, तेल और खाद के लिए चार लाख करोड़ रुपये की सब्सिडी के सरकारी वायदे कोरे साबित हुए। जून से लेकर अब तक पेट्रोल की कीमत में छह बार इजाफा किया जा चुका है। कीमत बढ़ने के साथ ही महंगाई दर भी बढ़ने लगी। लेकिन सरकार ने इसकी सुध नहीं ली। और अब सरकार जागी है। अब लोगों की चिंता सरकार को सताने लगी है। ये चिंता घटते वोट बैंक ये ज्यादा प्रेरित लगता है। अब देखना ये है कि आने वाले समय में सरकार लोगों का विश्वास जीतने में कामयाब होती है या नहीं।
महंगाई डायन के डरावने इरादों के बीच एक और खबर आई है विश्वबैंक से। ये रिपोर्ट कह रही है कि 2012 तक हमारी या भारत की तरक्की की रफ्तार चीन से तेज हो जाएगी। लेकिन, अब इसे अच्छी खबर कहेंगे या बुरी ये सोचने वाली बात है क्योंकि, हमारी सरकार कह रही है कि महंगाई की असली वजह हम-आप और तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है तो, क्या हमें खुद को तैयार कर लेना चाहिए कि हम दुनिया में सबसे ज्यादा महंगाई वाले देश बने रहेंगे। इस सवाल का जवाब सरकार को खोजना होगा।

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