कहने को देश आर्थिक विकास के तीसरे पायदान पर है। पर सच ये है कि देश की आबादी का एक बड़ा हिस्सा आर्थिक रूप से खुद को असुरक्षित महसूस करता है। दूसरी तरफ सरकार पिछले साल के मुकाबले इस साल विश्व बैंक से चार गुना ज्यादा कर्ज ले रहा है और यानी कर्जखोरी के मामले में देश दुनिया में अव्वल बनने जा रहा है। कर्ज का मकसद देश की सड़क, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधा को बेहतर बनाना है।सरकारी खर्चों पर बहस होती है लगाम नहीं लगायी जाती है। विपक्ष कितना भी हल्ला-हंगामा मचा ले सरकार कान देने को तैयार नहीं है। लाल सलाम का रंग तो कब का फीका पड़ चुका है। देश में महंगाई का हाहाकार मचा हुआ है। लेकिन सरकर तेल, गैस जैसी चीजों से सब्सिडी हटा कर और वैट बढ़ा कर फिजूल खर्ची में जुटी है। खास बात तो ये है आम आदमी से जुड़ी चीजों पर सब्सिडी उस वक्त तय की गयी थी जब देश में विकास दर कम थी प्रति व्यक्ति आय कम थी। गरीबी से जूझ रहे देश में खाद तेल, ईधन जैसी चीजों पर सब्सिडी दी गयी थी, तेल और खाद के लिए चार लाख करोड़ रुपये की सब्सिडी के सरकारी वायदे कोरे साबित हुए। जून से लेकर अब तक पेट्रोल की कीमत में छह बार इजाफा किया जा चुका है। कीमत बढ़ने के साथ ही महंगाई दर भी बढ़ने लगी। लेकिन सरकार ने इसकी सुध नहीं ली। और अब सरकार जागी है। अब लोगों की चिंता सरकार को सताने लगी है। ये चिंता घटते वोट बैंक ये ज्यादा प्रेरित लगता है। अब देखना ये है कि आने वाले समय में सरकार लोगों का विश्वास जीतने में कामयाब होती है या नहीं।
महंगाई डायन के डरावने इरादों के बीच एक और खबर आई है विश्वबैंक से। ये रिपोर्ट कह रही है कि 2012 तक हमारी या भारत की तरक्की की रफ्तार चीन से तेज हो जाएगी। लेकिन, अब इसे अच्छी खबर कहेंगे या बुरी ये सोचने वाली बात है क्योंकि, हमारी सरकार कह रही है कि महंगाई की असली वजह हम-आप और तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है तो, क्या हमें खुद को तैयार कर लेना चाहिए कि हम दुनिया में सबसे ज्यादा महंगाई वाले देश बने रहेंगे। इस सवाल का जवाब सरकार को खोजना होगा।
Monday, 17 January 2011
अब वित्त मंत्री ने 19 जनवरी को राज्यों के वित्त मंत्रियों की बैठक बुलाई है। जाहिर है अपनी सारी कोशिश कर चुकी सरकार अब राज्य सरकारों के कंधे पर महंगाई काबू करने की जिम्मेदारी डालने का मन बना चुकी है।
बढ़ती महंगाई से परेशान सरकार के तेवर अब कड़े होने लगे हैं। वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी का कहना है कि इसे बर्दाश्त नहीं किया जाएगा और इसे नियंत्रित करने के लिए सरकार से जो बन पड़ेगा वह करेगी। प्रणव मुखर्जी ने महंगाई से लड़ने के लिए राज्यों के वित्त मंत्रियों का बैठक 19 जनवरी को बुलाई है। उन्होंने कहा कि महंगाई का यह रूप सरकार को स्वीकार्य नहीं है और सरकार इसे नियंत्रित करने के लिए हर संभव प्रयास कर रही है। 19 जनवरी की बैठक में महंगाई के मुद्दे पर चर्चा होगी और राज्य सरकारों से इसमें सहयोग मांगा जाएगा। आखिर ऐसा क्या हो सकता है इस बैठक में कि सुरसा की तरह मुंह बाए खड़ी महंगाई अचानक से कम हो जाएगी। आखिर इस महंगाई को कम करने के लिए सरकार राज्य सरकार के साथ मिल कर क्या कर सकती है। दरअसल सरकार अब बढ़ती महंगाई का सारा ठीकरा राज्य सरकार के सर फोड़ने वाली है। राज्य सरकार से केंद्र सप्लाई बढ़ाने की मांग कर सकती है। वहीं राज्य सरकार को pds सिस्टम को सुधारने के लिए भी कहा जा सकता है। लेकिन, जिस तरह से महंगाई ने अपने कब्जे में देश को लिया है उसमें राज्यों की अलग-अलग कोशिश असर दिखा पाएगी ये मुश्किल ही दिख रहा है।
बढ़ती महंगाई से परेशान सरकार के तेवर अब कड़े होने लगे हैं। वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी का कहना है कि इसे बर्दाश्त नहीं किया जाएगा और इसे नियंत्रित करने के लिए सरकार से जो बन पड़ेगा वह करेगी। प्रणव मुखर्जी ने महंगाई से लड़ने के लिए राज्यों के वित्त मंत्रियों का बैठक 19 जनवरी को बुलाई है। उन्होंने कहा कि महंगाई का यह रूप सरकार को स्वीकार्य नहीं है और सरकार इसे नियंत्रित करने के लिए हर संभव प्रयास कर रही है। 19 जनवरी की बैठक में महंगाई के मुद्दे पर चर्चा होगी और राज्य सरकारों से इसमें सहयोग मांगा जाएगा। आखिर ऐसा क्या हो सकता है इस बैठक में कि सुरसा की तरह मुंह बाए खड़ी महंगाई अचानक से कम हो जाएगी। आखिर इस महंगाई को कम करने के लिए सरकार राज्य सरकार के साथ मिल कर क्या कर सकती है। दरअसल सरकार अब बढ़ती महंगाई का सारा ठीकरा राज्य सरकार के सर फोड़ने वाली है। राज्य सरकार से केंद्र सप्लाई बढ़ाने की मांग कर सकती है। वहीं राज्य सरकार को pds सिस्टम को सुधारने के लिए भी कहा जा सकता है। लेकिन, जिस तरह से महंगाई ने अपने कब्जे में देश को लिया है उसमें राज्यों की अलग-अलग कोशिश असर दिखा पाएगी ये मुश्किल ही दिख रहा है।
सरकार का दावा-वादा सब धराशायी हो चुका है। सरकारी आंकड़ों में खाने-पीने के सामान पिछले छे महीने से 15 परसेंट से ज्यादा की रफ्तार से महंगे हो रहे हैं। दूसरे जरूरी सामानों के भी महंगे होने की रफ्तार इससे कम नहीं है। दिसंबर की कुल महंगाई दर भी फिर से बढ़कर दस परसेंट की तरफ जाती दिख रही है।
सरकारी की ओर से महंगाई को काबू में करने चाहे कितने ही वादे किए जा रहे हों लेकिन महंगाई है कि कम होने का नाम नहीं ले रही है।
दिसंबर महीने में महंगाई दर के आंकड़े बढ़कर 8.43 परसेंट पर पहुंच गई है। वहीं नवंबर में महंगाई 7.48 फीसदी पर थी।
दिसंबर में प्राइमरी आर्टिकल्स की महंगाई दर भी बढ़कर 16.46 फीसदी पर पहुंच गई है। नवंबर में प्राइमरी आर्टिकल्स की महंगाई दर 13 फीसदी पर थी। दिसंबर में मैन्यूफैक्चरिंग प्रोडक्ट्स की महंगाई दर में हल्की गिरावट देखने को मिली है और ये घटकर 4.46 फीसदी पर आ गई है। इसके अलावा मैन्यूफैक्चरिंग प्रोडक्ट्स 0.4 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
दिसंबर में फ्यूल ग्रूप की महंगाई दर बढ़कर 11.19 फीसदी पर पहुंच गई है। हालांकि दिसंबर में कमोडिटीयों के 1.3 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। वहीं दिसंबर में थोक मूल्य सूचकांक पर आधारित खाद्य कीमतों का सूचकांक 13.55 फीसदी रहा। बढ़ती महंगाई से लोगों को राहत मिलती नहीं दिख रही है। इस बात का गवाह है महंगाई दर के आंकड़े। सरकार की ओर से महंगाई को काबू में करने चाहे कितने ही वादे किए जा रहे हों लेकिन महंगाई कम होने का नाम नहीं ले रही है। हालांकि महंगाई कम करने के तमाम सरकारी कोशिशें अब तक नाकाम साबित हुई है। लेकिन फिर भी वित्त मंत्री को उम्मीद है कि आने वाले समय में महंगाई जरूर कम होगी। लेकिन हम आपको याद दिला दें की वित्त मंत्री को महंगाई कम होने की उम्मीद पिछले एक साल से है... लेकिन ये महंगाई ही है जो कम होने का नाम नहीं लेती।
सरकारी की ओर से महंगाई को काबू में करने चाहे कितने ही वादे किए जा रहे हों लेकिन महंगाई है कि कम होने का नाम नहीं ले रही है।
दिसंबर महीने में महंगाई दर के आंकड़े बढ़कर 8.43 परसेंट पर पहुंच गई है। वहीं नवंबर में महंगाई 7.48 फीसदी पर थी।
दिसंबर में प्राइमरी आर्टिकल्स की महंगाई दर भी बढ़कर 16.46 फीसदी पर पहुंच गई है। नवंबर में प्राइमरी आर्टिकल्स की महंगाई दर 13 फीसदी पर थी। दिसंबर में मैन्यूफैक्चरिंग प्रोडक्ट्स की महंगाई दर में हल्की गिरावट देखने को मिली है और ये घटकर 4.46 फीसदी पर आ गई है। इसके अलावा मैन्यूफैक्चरिंग प्रोडक्ट्स 0.4 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
दिसंबर में फ्यूल ग्रूप की महंगाई दर बढ़कर 11.19 फीसदी पर पहुंच गई है। हालांकि दिसंबर में कमोडिटीयों के 1.3 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। वहीं दिसंबर में थोक मूल्य सूचकांक पर आधारित खाद्य कीमतों का सूचकांक 13.55 फीसदी रहा। बढ़ती महंगाई से लोगों को राहत मिलती नहीं दिख रही है। इस बात का गवाह है महंगाई दर के आंकड़े। सरकार की ओर से महंगाई को काबू में करने चाहे कितने ही वादे किए जा रहे हों लेकिन महंगाई कम होने का नाम नहीं ले रही है। हालांकि महंगाई कम करने के तमाम सरकारी कोशिशें अब तक नाकाम साबित हुई है। लेकिन फिर भी वित्त मंत्री को उम्मीद है कि आने वाले समय में महंगाई जरूर कम होगी। लेकिन हम आपको याद दिला दें की वित्त मंत्री को महंगाई कम होने की उम्मीद पिछले एक साल से है... लेकिन ये महंगाई ही है जो कम होने का नाम नहीं लेती।
सरकार कह रही है कि हमारी-आपकी जेब में पैसा बढ़ने की वजह से महंगाई बढ़ रही है। लेकिन, हमारी-आपकी जेब में आया पैसा कितना बढ़ा है इसका अंदाजा इसी से लग जाता है कि उद्योगों की बढ़ने की रफ्तार तीन परसेंट से भी कम रह गई है।यानी वो, उद्योग जो हमारी-आपकी जरूरत का सामान बनाते हैं उन्हें खरीदने वाले कम हो गए हैं। फिर भी सरकार कह रही है अर्थव्यवस्था में तेजी से महंगाई आई है।
देश के तेजी से आर्थिक विकास की उम्मीदों को तगड़ा झटका लगा है। नवंबर महीने के औद्योगिक उत्पादन के आंकड़ों ने सभी को निराश कर दिया है।
उस महीने इसकी विकास दर महज 2.7 परसेंट थी जबकि अक्टूबर में यह 11.29 परसेंट थी और पिछले साल यह 11.3 परसेंट थी। लेकिन राजधानी दिल्ली में योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलुवालिया ने कहा कि इन आंकड़ों से परेशान होने की जरूरत नहीं है।
भारत सरकार द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक अप्रैल से नवंबर के बीच औद्योगिक विकास की दर 9.5 रही जबकि इसके पिछले साल की इसी अवधि में यह 7.4 प्रतिशत थी।
इस मुद्दे पर चिंता जताते हुए वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने कहा कि आईआईपी आंकड़ों का गिरना चिंताजनक है और इसके रिकवरी के लिए जरूरी कदम उठाए जाएंगे।
हालांकि नवंबर में कैपिटल गुड्स की ग्रोथ में तेजी देखने को मिली है और ये 12.8 फीसदी रही, जबकि पिछले साल नवंबर में कैपिटल गुड्स की ग्रोथ 11 फीसदी रही थी। मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर की ग्रोथ में भी गिरावट दर्ज की गई है और ये नवंबर में 2.3 फीसदी रही। पिछले साल नवंबर में मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर की ग्रोथ 12.3 फीसदी पर थी।
माइनिंग सेक्टर की ग्रोथ भी नवंबर महीने में घटकर 6 फीसदी पर आ गई है, जबकि पिछले साल इसी महीने में माइनिंग सेक्टर की ग्रोथ 10.7 फीसदी थी। हालांकि इलेक्ट्रिसिटी सेक्टर की ग्रोथ में तेजी दर्ज की गई है। नवंबर में इलेक्ट्रिसिटी सेक्टर की ग्रोथ 4.6 फीसदी ही और पिछले साल की समानअवधि में इस सेक्टर की ग्रोथ 1.8 फीसदी रही थी। नवंबर महीने में कंज्यूमर गुड्स की ग्रोथ निगेटिव रही है और ये इस दौरान -3.1 फीसदी हो गई है। 2010 में नवंबर महीने में कंज्यूमर गुड्स की ग्रोथ 10.1 फीसदी रही थी। कंज्यूमर ड्यूरेबल्स की ग्रोथ में भी जबरदस्त गिरावट आई है। नवंबर में कंज्यूमर ड्यूरेबल्स की ग्रोथ 4.3 फीसदी रही, जबकि पिछले साल इसकी ग्रोथ 36.3 फीसदी रही थी। वहीं नवंबर में औद्योगिक विकास में गिरावट आने से आरबीआई के सामने नई मुश्किल खड़ी हो गई है। अब महंगाई कम करने के साथ-साथ आर्थिक विकास बनाए रखने की दोहरी जिम्मेदारी आरबीआई पर है। इस महीने रिजर्व बैंक अपने का एलान करने वाला है माना जा रहा है कि इस बार आरबीआई ब्याज दरों में इजाफा कर सकती है।
देश के तेजी से आर्थिक विकास की उम्मीदों को तगड़ा झटका लगा है। नवंबर महीने के औद्योगिक उत्पादन के आंकड़ों ने सभी को निराश कर दिया है।
उस महीने इसकी विकास दर महज 2.7 परसेंट थी जबकि अक्टूबर में यह 11.29 परसेंट थी और पिछले साल यह 11.3 परसेंट थी। लेकिन राजधानी दिल्ली में योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलुवालिया ने कहा कि इन आंकड़ों से परेशान होने की जरूरत नहीं है।
भारत सरकार द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक अप्रैल से नवंबर के बीच औद्योगिक विकास की दर 9.5 रही जबकि इसके पिछले साल की इसी अवधि में यह 7.4 प्रतिशत थी।
इस मुद्दे पर चिंता जताते हुए वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने कहा कि आईआईपी आंकड़ों का गिरना चिंताजनक है और इसके रिकवरी के लिए जरूरी कदम उठाए जाएंगे।
हालांकि नवंबर में कैपिटल गुड्स की ग्रोथ में तेजी देखने को मिली है और ये 12.8 फीसदी रही, जबकि पिछले साल नवंबर में कैपिटल गुड्स की ग्रोथ 11 फीसदी रही थी। मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर की ग्रोथ में भी गिरावट दर्ज की गई है और ये नवंबर में 2.3 फीसदी रही। पिछले साल नवंबर में मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर की ग्रोथ 12.3 फीसदी पर थी।
माइनिंग सेक्टर की ग्रोथ भी नवंबर महीने में घटकर 6 फीसदी पर आ गई है, जबकि पिछले साल इसी महीने में माइनिंग सेक्टर की ग्रोथ 10.7 फीसदी थी। हालांकि इलेक्ट्रिसिटी सेक्टर की ग्रोथ में तेजी दर्ज की गई है। नवंबर में इलेक्ट्रिसिटी सेक्टर की ग्रोथ 4.6 फीसदी ही और पिछले साल की समानअवधि में इस सेक्टर की ग्रोथ 1.8 फीसदी रही थी। नवंबर महीने में कंज्यूमर गुड्स की ग्रोथ निगेटिव रही है और ये इस दौरान -3.1 फीसदी हो गई है। 2010 में नवंबर महीने में कंज्यूमर गुड्स की ग्रोथ 10.1 फीसदी रही थी। कंज्यूमर ड्यूरेबल्स की ग्रोथ में भी जबरदस्त गिरावट आई है। नवंबर में कंज्यूमर ड्यूरेबल्स की ग्रोथ 4.3 फीसदी रही, जबकि पिछले साल इसकी ग्रोथ 36.3 फीसदी रही थी। वहीं नवंबर में औद्योगिक विकास में गिरावट आने से आरबीआई के सामने नई मुश्किल खड़ी हो गई है। अब महंगाई कम करने के साथ-साथ आर्थिक विकास बनाए रखने की दोहरी जिम्मेदारी आरबीआई पर है। इस महीने रिजर्व बैंक अपने का एलान करने वाला है माना जा रहा है कि इस बार आरबीआई ब्याज दरों में इजाफा कर सकती है।
महंगाई की मार
जब सरकार ही महंगाई के सामने घुटने टेक चुकी है तो फिर आपकी और हमारी क्या बिसात... लगातार छह महीने से महंगाई से परेशान जनता की सुध अब सरकार लेगी। महंगाई के पीछे सरकार की दलीलें कुछ इस तरह की है कि खुद महंगाई भी शर्म से पानी पानी हो जाए।
सरकार यानी पालनहार, जनता सरकार इसलिए चुनती है कि उसके हितों की रक्षा हो। चुनाव से पहले जनहित के वायदे किये जाते हैं पर सरकार बनते ही ये सारे वायदे कोरे हो जाते हैं। आम आदमी बेतहाशा बढ़ती महंगाई से बेहाल है और सरकार है कि बयान बाजी से लोगों का पेट भर रही है। सरकार का मानना है कि बढ़ती महंगाई के लिए लोग ही जिम्मेदार हैं। प्रणब मुखर्जी का मानना है आप ज्यादा खाते हैं इसलिए महंगाई ज्यादा बढ़ रही है। यही नहीं सरकार कह रही है लोगों की जेब में बढ़ गया है पैसा.. यानी आपकी जेब पहले के मुकाबले ज्यादा वजनी हो गई है... सरकार का मानना है कि लोगों की आमदनी बढ़ने से बढ़ी है महंगाई।
एक अनुमान के मुताबिक, 2008 के बाद से अब तक लोगों की आमदनी बढ़ी 5-10%। लेकिन हम आपको बता दें कि 2008 के बाद महंगाई करीब 30 परसेंट बढ़ी है।
अगर आमदनी बढ़ने से मांग बढ़ी है तो फिर पांच या दस परसेंट ही महंगाई भी बढ़नी चाहिए थी... सरकार अब अर्थव्यवस्था में तेजी को भी बढ़ती महंगाई का जिम्मेदार मानती है... सरकार ने कहा है कि अर्थव्यवस्था की रफ्तार के कारण ही दूध, अंडा, मछली, मीट महंगा हुआ है। और तो और पूरी तरह मॉनसून पर आधारित खेती प्रधान देश में सरकार का बयान है कि बारिश के कारण फसल बर्बाद हुई जिससे महंगाई बढ़ी है। पहले बारिश नहीं हुई तो महंगाई बढ़ी और अब बारिश हुई तो महंगाई बढ़ी। सरकार ने बढ़ती महंगाई पर लगाम लगाने के लिए कुछ जरूरी कदम उठाने का एलान कर चुकी है...
सरकार ने ऐलान किया है कि इंपोर्ट-एक्सपोर्ट पॉलिसी की समीक्षा होगी.. वहीं जरूरी कमोडिटीज की समीक्षा की भी घोषणा की गई है। सरकार जनता की प्राथमिकता से बेखबर है या लापरवाह यह एक सवाल है। साल 2010-11 को केन्द्रीय बजट पर नजर डाले तो सरकार ने तमाम चीजों की कीमत घटाई जो विलासता की हैं। बढ़ने वाले मूल्यों में सिगरेट और तंबाकू जिससे सरकार की आय होती, जिसके बढ़ने का विरोध नहीं किया जाता इसे छोड़ दिया जाये तो वे तमाम चीजें हैं, जिसका सीधा असर आम आदमी पर पड़ता है।
पिछले एक साल में कीमतों पर नजर डालें तो प्याज 182 परसेंट महंगा हुआ है.. वहीं सब्जियां और तेल की कीमत भी 70 परसेंट तेज हुई। इसके बावजूद सरकार महंगाई के खिलाफ कोई ठोस कदम उठाने में लाचार दिख रही है।
सरकार यानी पालनहार, जनता सरकार इसलिए चुनती है कि उसके हितों की रक्षा हो। चुनाव से पहले जनहित के वायदे किये जाते हैं पर सरकार बनते ही ये सारे वायदे कोरे हो जाते हैं। आम आदमी बेतहाशा बढ़ती महंगाई से बेहाल है और सरकार है कि बयान बाजी से लोगों का पेट भर रही है। सरकार का मानना है कि बढ़ती महंगाई के लिए लोग ही जिम्मेदार हैं। प्रणब मुखर्जी का मानना है आप ज्यादा खाते हैं इसलिए महंगाई ज्यादा बढ़ रही है। यही नहीं सरकार कह रही है लोगों की जेब में बढ़ गया है पैसा.. यानी आपकी जेब पहले के मुकाबले ज्यादा वजनी हो गई है... सरकार का मानना है कि लोगों की आमदनी बढ़ने से बढ़ी है महंगाई।
एक अनुमान के मुताबिक, 2008 के बाद से अब तक लोगों की आमदनी बढ़ी 5-10%। लेकिन हम आपको बता दें कि 2008 के बाद महंगाई करीब 30 परसेंट बढ़ी है।
अगर आमदनी बढ़ने से मांग बढ़ी है तो फिर पांच या दस परसेंट ही महंगाई भी बढ़नी चाहिए थी... सरकार अब अर्थव्यवस्था में तेजी को भी बढ़ती महंगाई का जिम्मेदार मानती है... सरकार ने कहा है कि अर्थव्यवस्था की रफ्तार के कारण ही दूध, अंडा, मछली, मीट महंगा हुआ है। और तो और पूरी तरह मॉनसून पर आधारित खेती प्रधान देश में सरकार का बयान है कि बारिश के कारण फसल बर्बाद हुई जिससे महंगाई बढ़ी है। पहले बारिश नहीं हुई तो महंगाई बढ़ी और अब बारिश हुई तो महंगाई बढ़ी। सरकार ने बढ़ती महंगाई पर लगाम लगाने के लिए कुछ जरूरी कदम उठाने का एलान कर चुकी है...
सरकार ने ऐलान किया है कि इंपोर्ट-एक्सपोर्ट पॉलिसी की समीक्षा होगी.. वहीं जरूरी कमोडिटीज की समीक्षा की भी घोषणा की गई है। सरकार जनता की प्राथमिकता से बेखबर है या लापरवाह यह एक सवाल है। साल 2010-11 को केन्द्रीय बजट पर नजर डाले तो सरकार ने तमाम चीजों की कीमत घटाई जो विलासता की हैं। बढ़ने वाले मूल्यों में सिगरेट और तंबाकू जिससे सरकार की आय होती, जिसके बढ़ने का विरोध नहीं किया जाता इसे छोड़ दिया जाये तो वे तमाम चीजें हैं, जिसका सीधा असर आम आदमी पर पड़ता है।
पिछले एक साल में कीमतों पर नजर डालें तो प्याज 182 परसेंट महंगा हुआ है.. वहीं सब्जियां और तेल की कीमत भी 70 परसेंट तेज हुई। इसके बावजूद सरकार महंगाई के खिलाफ कोई ठोस कदम उठाने में लाचार दिख रही है।
महंगाई की मार
आखिर क्यों बढ़ती है महंगाई? ये एक सवाल है जो आज कल आम आदमी को अंदर ही अंदर खाए जा रही है। सरकार की मानें तो आप ज्यादा खाना खा रहे हैं इसलिए महंगाई बढ़ रही है।
अब आप खाना खाना भूल ही जांए तो ही महंगाई से निजात मिल पाएगी। ये हम नहीं कह रहे हैं.. ये कहना है खुद वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी का। वित्त मंत्री का साफ मानना है कि आप और हम यानी कॉमन मैन जितना खाना खाएंगे उतनी ही महंगाई बढ़ेगी। सरकार ने महंगाई पर जितने तीर छोड़े, वे सब महंगाई का ही शिकार हो गए। सरकार ने गुरुवार को फूड इंफ्लेशन को काबू करने के लिए कई उपायों का एलान किया, लेकिन अपनी दयनीय हालत दिखाते हुए यह भी कह दिया कि सब्जियों और फलों के कुलांचे मारते दाम नियंत्रित करने के लिए उसके पास सीमित हथियार हैं। दरअसल, महंगाई दर में आए उछाल के मौजूदा दौर को फल-सब्जियों की उफान मारती कीमतों से ही सहारा मिला है। प्रधानमंत्री कार्यालय की ओर से जारी बयान में कहा गया कि सरकार नियमित रूप से सभी आवश्यक कमोडिटी के निर्यात और आयात की समीक्षा करेगी और जमाखोरों और कालाबाजारी में शामिल लोगों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी। सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों को दाल और खाद्य तेल जैसे आवश्यक चीजों की खरीदारी बढ़ाने के निर्देश दिए, ताकि रीटेल आउटलेट पर कम दरों पर उनका डिस्ट्रीब्यूशन किया जा सके। सरकार ने नेफेड से प्याज 35 रुपए प्रति किलोग्राम पर बेचने को भी कहा। महंगाई दर में इतनी बढ़ोतरी के पीछे प्याज के दामों में आई तेजी काफी हद तक जिम्मेदार है। सरकार महंगाई को काबू करने में अब सीधे अपनी लाचारी जाहिर कर रही है। उसने कहा कि खाद्य कीमतों को लंबे वक्त तक नियंत्रण में रखने का एकमात्र समाधान कृषि उत्पादकता बढ़ाना है।
पीएमओ की ओर से जारी एक बयान में कहा गया है, इंफ्लेशन की हालिया तेजी सब्जियों और फलों के दामों में आने वाली बढ़ोतरी की वजह से है, जिन्हें संभालना काफी मुश्किल है, क्योंकि ये कमोडिटी सरकारी स्टॉक में नहीं रखी जातीं।' सरकार ने महंगाई दर काबू में करने के लिए मध्यम से लंबी अवधि के कई उपाय सुझाए। सरकार ने कहा कि उसने किसान मंडी और मोबाइल बाजार बनाने की योजना तैयार की है। वह राज्यों से मंडी टैक्स, चुंगी और अन्य स्थानीय शुल्क हटाने पर विचार करने को भी कहेगी, ताकि आवश्यक कमोडिटी की आवाजाही में आसानी हो। लंबी अवधि के उपायों पर जोर इसलिए दिया जाने लगा है क्योंकि अब यह महसूस किया जा रहा है कि खाद्य मुद्रास्फीति दर लंबी अवधि का ढांचागत मुद्दा न बन जाए। वहीं मौद्रिक मोर्चे पर पेंच कसने से भी इस समस्या से निजात मिलती नहीं दिख रही। आरबीआई के कदमों से तो बैंक लोन पहले ही महंगे हो गए हैं.. इसमें और बढ़ोत्तरी से बैंकों के सामने मुश्किलें खड़ी हो जाएगी। सरकारी बैठक और बयानबाजी के बाद जो फैसला लिया गया है.. उससे ये साफ जाहिर है कि बढ़ती महंगाई से अगले छह महीनों तक आपको निजात नहीं मिलने वाली है। सरकार महंगाई पर काबू पाने के लिए जितने कदम उठाने का घोषणा कर रही है.. ये सब या तो लांग टर्म है या फिर मिड टर्म। और इन कदमों का असर आने वाले छह महीनों में नहीं दिखने वाला... हां अपने किचन के बजट को आप अगर नहीं बिगाड़ना चाहते हैं तो आप खाना कम जरूर कर सकते हैं।
अब आप खाना खाना भूल ही जांए तो ही महंगाई से निजात मिल पाएगी। ये हम नहीं कह रहे हैं.. ये कहना है खुद वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी का। वित्त मंत्री का साफ मानना है कि आप और हम यानी कॉमन मैन जितना खाना खाएंगे उतनी ही महंगाई बढ़ेगी। सरकार ने महंगाई पर जितने तीर छोड़े, वे सब महंगाई का ही शिकार हो गए। सरकार ने गुरुवार को फूड इंफ्लेशन को काबू करने के लिए कई उपायों का एलान किया, लेकिन अपनी दयनीय हालत दिखाते हुए यह भी कह दिया कि सब्जियों और फलों के कुलांचे मारते दाम नियंत्रित करने के लिए उसके पास सीमित हथियार हैं। दरअसल, महंगाई दर में आए उछाल के मौजूदा दौर को फल-सब्जियों की उफान मारती कीमतों से ही सहारा मिला है। प्रधानमंत्री कार्यालय की ओर से जारी बयान में कहा गया कि सरकार नियमित रूप से सभी आवश्यक कमोडिटी के निर्यात और आयात की समीक्षा करेगी और जमाखोरों और कालाबाजारी में शामिल लोगों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी। सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों को दाल और खाद्य तेल जैसे आवश्यक चीजों की खरीदारी बढ़ाने के निर्देश दिए, ताकि रीटेल आउटलेट पर कम दरों पर उनका डिस्ट्रीब्यूशन किया जा सके। सरकार ने नेफेड से प्याज 35 रुपए प्रति किलोग्राम पर बेचने को भी कहा। महंगाई दर में इतनी बढ़ोतरी के पीछे प्याज के दामों में आई तेजी काफी हद तक जिम्मेदार है। सरकार महंगाई को काबू करने में अब सीधे अपनी लाचारी जाहिर कर रही है। उसने कहा कि खाद्य कीमतों को लंबे वक्त तक नियंत्रण में रखने का एकमात्र समाधान कृषि उत्पादकता बढ़ाना है।
पीएमओ की ओर से जारी एक बयान में कहा गया है, इंफ्लेशन की हालिया तेजी सब्जियों और फलों के दामों में आने वाली बढ़ोतरी की वजह से है, जिन्हें संभालना काफी मुश्किल है, क्योंकि ये कमोडिटी सरकारी स्टॉक में नहीं रखी जातीं।' सरकार ने महंगाई दर काबू में करने के लिए मध्यम से लंबी अवधि के कई उपाय सुझाए। सरकार ने कहा कि उसने किसान मंडी और मोबाइल बाजार बनाने की योजना तैयार की है। वह राज्यों से मंडी टैक्स, चुंगी और अन्य स्थानीय शुल्क हटाने पर विचार करने को भी कहेगी, ताकि आवश्यक कमोडिटी की आवाजाही में आसानी हो। लंबी अवधि के उपायों पर जोर इसलिए दिया जाने लगा है क्योंकि अब यह महसूस किया जा रहा है कि खाद्य मुद्रास्फीति दर लंबी अवधि का ढांचागत मुद्दा न बन जाए। वहीं मौद्रिक मोर्चे पर पेंच कसने से भी इस समस्या से निजात मिलती नहीं दिख रही। आरबीआई के कदमों से तो बैंक लोन पहले ही महंगे हो गए हैं.. इसमें और बढ़ोत्तरी से बैंकों के सामने मुश्किलें खड़ी हो जाएगी। सरकारी बैठक और बयानबाजी के बाद जो फैसला लिया गया है.. उससे ये साफ जाहिर है कि बढ़ती महंगाई से अगले छह महीनों तक आपको निजात नहीं मिलने वाली है। सरकार महंगाई पर काबू पाने के लिए जितने कदम उठाने का घोषणा कर रही है.. ये सब या तो लांग टर्म है या फिर मिड टर्म। और इन कदमों का असर आने वाले छह महीनों में नहीं दिखने वाला... हां अपने किचन के बजट को आप अगर नहीं बिगाड़ना चाहते हैं तो आप खाना कम जरूर कर सकते हैं।
पेट्रोल कंपनियों ने एक बार फिर घाटे का रोना रो कर पेट्रोल की कीमत बढ़ाने का एलान कर ही दिया। पिछले एक महीने में पेट्रोल की कीमत करीब पांच रुपए बढ़ गई है। और 25 जून के बाद से अब तक कंपनियों ने तकरीबन नौ रुपए प्रति लीटर का इजाफा कर दिया है। विपक्ष के हंगामे के बावजूद सरकार ने आम जनता को राहत नहीं दी। वहीं पेट्रोल की कीमत बढ़ने के बावजूद पिछले छह महीने में पेट्रोल की खपत 15 परसेंट बढ़ी है। लगता है कि अब लोगों को भी बढ़ी कीमतों की आदत हो गई है। पेट्रोल की बढ़ती कीमत के कारण अब पेट्रोल कार की मांग में गिरावट आ सकती है। कुछ हो न हो लेकिन ये सरकार और तेल कंपनियों के लिए खतरे की घंटी जरूर है। तेल कंपनियों को हो रहे कुल घाटे का 20 परसेंट हिस्सा पेट्रोल की वजह से हो रहा है। वहीं डीजल पर घाटा कुल घाटे का 60 परसेंट है। वहीं अब डीजल कार की मांग बढ़ने से सरकार पर डीजल की कीमत को डीकंट्रोल करने का दबाव बढ़ जाएगा। वहीं इंडियन ऑयल, हिंदुस्तान पेट्रोलियम और भारत पेट्रोलियम को पिछले छह महीने में डीजल, गैस और केरोसीन पर 40 हजार करोड़ का घाटा होने का अनुमान लगाया जा रहा है। इसमें से सिर्फ डीजल पर 25 हजार करोड़ का घाटा होना तय है। सरकार पहले से ही बढ़ती महंगाई से बुरी तरह झुलसी है। और अब वो डीजल की कीमत बढ़ा कर लोगों के गुस्से का इंताह नहीं लेना चाहेगी। हालांकि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमत में लगातार भढ़ोत्तरी से भी कंपनियों पर दबाव बना हुआ है। आने वाले समय में कच्चे तेल की कीमत $100 प्रति बैरल तक जा सकती है। अगर ऐसा होता है तो पेट्रोल की कीमत 70 रुपए प्रति लीटर तक पहुंच जाएगी। वहीं महंगाई के दबाव में सरकार डीजल की कीमत में इजाफा करने से घबराएगी। यदी ऐसा होता है तो कंपनियों पर दबाव और बढ़ेगा। हालांकि सरकार एक काम और कर सकती है। पेट्रोल और डीजल की कीमत कम करने और कंपनियों के घाटे को पाटने के लिए सरकार पेट्रोल और डीजल पर लगने वाले टैक्स को कम कर सकती है।
दिल्ली में प्रति लीटर ईंधन में टैक्स का ढांचा
पेट्रोल
कस्टम ड्यूटी- 3.2 फीसदी
एक्साइज ड्यूटी- 14.7 फीसदी
स्टेट वैट- 16.7 फीसदी
बिना टैक्स का दाम-51.4 फीसदी
डीज़ल
कस्टम ड्यूटी- 4.7एक्साइज ड्यूटी- 4.74 स्टेट वैट- 4.43बिना टैक्स के दाम कुल मूल्य का- 70.8 फीसदी
पेट्रोल
कस्टम ड्यूटी- 3.2 फीसदी
एक्साइज ड्यूटी- 14.7 फीसदी
स्टेट वैट- 16.7 फीसदी
बिना टैक्स का दाम-51.4 फीसदी
डीज़ल
कस्टम ड्यूटी- 4.7एक्साइज ड्यूटी- 4.74 स्टेट वैट- 4.43बिना टैक्स के दाम कुल मूल्य का- 70.8 फीसदी
विदेशों में प्रेट्रोल की कीमतें
भारत 55.86 रुपए
पाकिस्तान 31.43 रुपए
नेपाल 49.87 रुपए
श्रीलंका 63.96 रुपए
यूएई 18.40 रुपए
सउदी अरब 5.71 रुपए
बहरीन 9.57 रुपए
कतर 9.82 रुपए
यूएसए 26.98 रुपए
ऑस्ट्रेलिया 43.84 रुपए
भारत 55.86 रुपए
पाकिस्तान 31.43 रुपए
नेपाल 49.87 रुपए
श्रीलंका 63.96 रुपए
यूएई 18.40 रुपए
सउदी अरब 5.71 रुपए
बहरीन 9.57 रुपए
कतर 9.82 रुपए
यूएसए 26.98 रुपए
ऑस्ट्रेलिया 43.84 रुपए
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